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रिश्ता खत्म करने के फैसले को धोखा या फ्रॉड नहीं कहा जा सकता, लिव-इन-रिलेशन को लेकर SC की सख्त टिप्पणी

 Reported By: Atul Bhatia,  Written By: Kajal Kumari
 Published : Oct 30, 2026 02:28 pm IST,  Updated : Oct 30, 2026 03:10 pm IST

अगर दो बालिग आपसी सहमति से प्रेम संबंध में रहते हैं और उनके बीच शारीरिक संबंध बनते हैं, तो रिश्ता टूटने के बाद उन संबंधों को सिर्फ इस वजह से रेप नहीं माना जा सकता कि अब दोनों साथ नहीं हैं। लिव-इन रिलेशन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है।

लिव इन रिलेशन पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी- India TV Hindi
लिव इन रिलेशन पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने लिव इन रिलेशन को लेकर कहा कि अगर दो बालिग आपसी सहमति से प्रेम संबंध में रहते हैं और उनके बीच शारीरिक संबंध बनते हैं, तो रिश्ता टूटने के बाद उन संबंधों को सिर्फ इस वजह से रेप नहीं माना जा सकता कि अब दोनों साथ नहीं हैं। कोर्ट ने यह टिप्पणी शादी का झूठा वादा करके रेप करने के आरोप से जुड़े एक मामले में की। कोर्ट ने आरोपी व्यक्ति को मामले में लगे आरोपों से मुक्त कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाल के वर्षों में एक चिंताजनक चलन देखने को मिला है, जिसमें आपसी सहमति से बने रिश्ते के खत्म होने के बाद आपराधिक कानून का सहारा लिया जाता है।

कोर्ट ने साफ किया कि अगर शुरुआत से ही शादी का झूठा वादा करके किसी की सहमति हासिल की गई थी, तो मामला अलग हो सकता है। लेकिन रिश्ता बाद में खराब हो जाने या टूट जाने के कारण पहले बनाए गए सहमति वाले शारीरिक संबंधों को अपने आप रेप नहीं माना जा सकता।

रिश्ता खत्म करने का भी अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को इस डर से रिश्ता जारी रखना पड़े कि अलग होने पर उस पर रेप का आरोप लग सकता है, तो यह उसकी अपनी मर्जी से फैसला लेने की आजादी को खत्म कर देगा। कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या किसी व्यक्ति को रिश्ता खत्म करने का अधिकार नहीं है? सिर्फ रिश्ता खत्म करने के फैसले को धोखा या फ्रॉड नहीं कहा जा सकता।

रेप के मामलों को गंभीरता से लेना जरूरी
कोर्ट ने यह भी कहा कि रेप एक गंभीर अपराध है और इसे उन्हीं मामलों में लागू किया जाना चाहिए, जहां यौन हिंसा, दबाव या सहमति में धोखाधड़ी के साफ संकेत हों। बेंच ने माना कि रेप की कई घटनाएं सामने नहीं आ पातीं और पीड़ित महिलाएं बदनामी के डर से चुप रह जाती हैं। इसलिए जहां यौन हिंसा के साफ सबूत हों, वहां ऐसे मामलों की गंभीरता से जांच और कार्रवाई होनी चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को केवल इसलिए परेशान करने के लिए आपराधिक कानून का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए क्योंकि उसने आपसी सहमति से बने रिश्ते को खत्म कर दिया है।

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